यूपी में वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड से 73 हजार संपत्तियां गायब! पूर्व मंत्री मोहसिन रजा ने की SIT जांच की मांग

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। दावा किया गया है कि प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के रिकॉर्ड में कभी दो लाख से अधिक संपत्तियां दर्ज थीं, लेकिन अब दस्तावेजों में करीब 1.27 लाख संपत्तियां ही दर्ज हैं। ऐसे में करीब 73 हजार संपत्तियों का अंतर सामने आ रहा है। सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में संपत्तियां मौजूदा रिकॉर्ड से बाहर कैसे हो गईं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड, उनके इस्तेमाल और कथित कब्जों को लेकर पहले से बहस चल रही है। पूरे मामले की तह तक पहुंचने के लिए पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान दस्तावेजों का मिलान करने के साथ-साथ जमीन पर संपत्तियों की वास्तविक स्थिति की जांच भी जरूरी मानी जा रही है।

सबसे पहले समझिए, मामला क्या है

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के रिकॉर्ड में पहले दो लाख से ज्यादा संपत्तियां दर्ज होने का दावा है। वर्तमान में रजिस्टर्ड वक्फ दस्तावेजों की संख्या करीब 1.27 लाख बताई जा रही है।

यानी पुराने और मौजूदा आंकड़ों के बीच करीब 73 हजार संपत्तियों का अंतर है। इसे ही लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि ये संपत्तियां रिकॉर्ड से क्यों और कैसे गायब हुईं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सभी 73 हजार संपत्तियां वास्तव में गायब या कब्जे में हैं या आंकड़ों में अंतर के पीछे रिकॉर्ड के अद्यतन, पंजीकरण अथवा अन्य प्रशासनिक कारण भी हैं। इसकी वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

रिकॉर्ड से नाम हटने और संपत्ति पर कब्जे में क्या अंतर है?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी संपत्ति का मौजूदा रिकॉर्ड में दर्ज न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उस पर अवैध कब्जा हो गया है। इसके पीछे रिकॉर्ड अपडेट नहीं होने, पुराने और नए दस्तावेजों में अंतर या पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रिया जैसी वजहें भी हो सकती हैं।

दूसरी स्थिति तब होगी, जब किसी संपत्ति का वक्फ रिकॉर्ड मौजूद हो लेकिन जमीन पर किसी अन्य व्यक्ति या संस्था का कब्जा पाया जाए। इसलिए पूरे मामले में दस्तावेजी जांच के साथ जमीन का भौतिक सत्यापन भी अहम होगा।

किन जिलों में उठे सवाल?

वक्फ संपत्तियों को लेकर लखनऊ, गाजियाबाद, कानपुर, मेरठ, सहारनपुर, अयोध्या, बरेली, नोएडा, आगरा, प्रयागराज, अलीगढ़, वाराणसी, अमरोहा, बिजनौर और आजमगढ़ समेत कई जिलों में शिकायतों का दावा किया गया है।

आरोप है कि कुछ वक्फ संपत्तियों पर कब्जे हैं और कुछ का इस्तेमाल उनके मूल धार्मिक या सामाजिक उद्देश्य के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। अगर जांच होती है तो इन दावों की भी संपत्ति-दर-संपत्ति पड़ताल की जा सकती है।

क्यों जरूरी है पुराने रिकॉर्ड का मिलान?

73 हजार संपत्तियों के अंतर को समझने के लिए सबसे पहले पुराने वक्फ रिकॉर्ड और मौजूदा डिजिटल या रजिस्टर्ड दस्तावेजों का मिलान करना होगा। इससे यह पता चल सकता है कि कौन सी संपत्ति पुराने रिकॉर्ड में थी और वर्तमान सूची में उसका विवरण क्यों नहीं है।

इसके बाद संपत्ति की जमीन पर मौजूदगी, मौजूदा कब्जा, इस्तेमाल, नामांतरण, लीज और संबंधित दस्तावेजों की जांच करनी होगी। इस प्रक्रिया से रिकॉर्ड में कमी और वास्तविक संपत्ति की स्थिति के बीच संबंध स्पष्ट हो सकता है।

कहां से आया ऑडिट का मुद्दा?

पूर्व मंत्री मोहसिन रजा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस पूरे मामले की जनपदवार एसआईटी जांच कराने की मांग की है। उन्होंने शिया और सुन्नी दोनों वक्फ बोर्डों की संपत्तियों का विशेष ऑडिट और भौतिक सत्यापन कराने की बात रखी है।

मांग में कथित फर्जी नामांतरण, अवैध लीज और कब्जों की जांच के साथ दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की बात भी शामिल है। मुख्यमंत्री की ओर से मामले की जांच का आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

जांच हुई तो सामने आएगी 73 हजार संपत्तियों की पूरी तस्वीर

इस मामले में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल संख्या को लेकर है—अगर पुराने रिकॉर्ड में दो लाख से ज्यादा वक्फ संपत्तियां थीं और अब करीब 1.27 लाख दर्ज हैं, तो बाकी संपत्तियों का क्या हुआ?

इसका जवाब केवल पुराने और नए आंकड़ों की तुलना से नहीं मिलेगा। हर संपत्ति का रिकॉर्ड, जमीन पर उसकी स्थिति और उसके वर्तमान इस्तेमाल की जांच करनी होगी। तभी यह साफ हो सकेगा कि 73 हजार का अंतर किन कारणों से पैदा हुआ है और इनमें से कितनी संपत्तियां वास्तव में रिकॉर्ड से बाहर हैं, कितनी पर कब्जे की शिकायत सही है और कितनी के मामले में दस्तावेजी या प्रशासनिक वजहें जिम्मेदार हैं।

 

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